आजकल एक चर्चा हो रही है। शिक्षा क्षेत्रा के संदर्भ में। वो यह कि छात्र आन्दोलन अप्रासंगिक हो गया है। ये कि आज के भारत में छात्र आन्दोलनों की कोई आवश्यकता नहीं है याकि छात्र आन्दोलन दिशाहीन होते हैं। इसीलिए उनका होना राष्ट्रहित में नहीं। या कि छात्र आन्दोलन देश के विद्यार्थियों के कैरियर में बाधा पहुंचाएगा और इस तरह देश के निर्माण में भी। इस प्रकार के बहुत सारे प्रश्न हैं जो छात्रा आन्दोलन के भविष्य को लेकर उठ रहे हैं। छात्र आन्दोलन के भविष्य की चिन्ता करने वालों में दोनों प्रकार के लोग हैं। वे जो छात्र आन्दोलन के पक्षधर हैं। और वे जो किसी भी प्रकार के छात्र आन्दोलन को निरर्थक मानते हैं। 
वस्तुतः क्या छात्र आन्दोलन अब देश के विकास के लिए आवश्यक नहीं रहे। और क्या पिछले छात्र आन्दोलनों से देश के भविष्य को सवांरने में कोई योगदान हासिल हुआ है। यह सवाल इस मायने में भी महत्वपूर्ण है जब कुछ लोग यह मानते हैं कि छात्रा आन्दोलन निरर्थक हैं। 
दरअसल छात्र आन्दोलन का इतिहास तत्कालीन दमनकारी नीतियों, व्यवस्था की खामियों और गुलामी के बोझ के विरु( व्यापक संघर्ष और बलिदान का इतिहास रहा है। इतिहास लेखन में अगर भारतीय छात्र आन्दोलनों के इतिहास लेखन का ध्यान रखा गया होता तो उसमें अनेक स्वर्णिम और गौरवमयी पृष्ठ जुड़ते। 
अपने देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के प्रयास से छात्र कैसे अछूते रह सकते हैं। इसीलिए सन् 1874 ई. में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आनन्द मोहन बोस ने ‘कोलकाता स्टुडेण्ट एसोसिएशन’ की स्थापना कर भारत के स्वतंत्राता आन्दोलन, स्वदेशी आन्दोलनों में छात्रों के साथ बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। स्वतंत्रता आन्दोलन के हमारे प्रमुख महान नेताओं लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, विपिन चन्द्र पाल, एनीबेसेंट आदि ने छात्र जागरण के माध्यम से जन आन्दोलन में प्राण पफूंकने का काम किया।
भारत में छात्र आन्दोलन की आवश्यकता के विचार पर एक बड़ा ऐतिहासिक और क्रान्तिकारी मोड़ तब आया जब 1920 ई. में महात्मा गांधी ने अपने प्रसि( असहयोग आन्दोलन में देश के छात्रों से पढ़ाई छोड़कर शामिल होने का आह्वान किया। सुभाषचन्द्र बोस, जय प्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया आदि नेताओं के स्फूर्ति केन्द्र छात्रा ही थे। 1942 का भारत छोड़ों आन्दोलन भी छात्रों की प्रभावी उपस्थिति के कारण प्राणवन्त और प्रभावशाली बना। हालांकि इस समय भी छात्र आन्दोलनों को लेकर दो तरह की सोच थी एक यह कि छात्र पूरी तरह केवल पढ़ाई करे और बाद में राष्ट्रीय समस्याओं व राष्ट्रीय विकास में योगदान दें। दूसरी यह कि हर बड़े कार्य में देश के सभी वर्गों की साझेदारी हो। और इसमें छात्र भी सम्मलित हों।
देश के स्वतंत्राता आन्दोलन के इतिहास को सरसरी तौर पर जानने वालों को भी यह ज्ञान है कि स्वतंत्रता संग्राम में छात्रों की क्या भूमिका रही? अपने देश के लिए संघर्ष करने यहां तक कि प्राण देने में भी छात्र कभी पीछे नहीं रहे। उनका आन्दोलनों में कूदना कभी-भी अनुशासन हीनता, अपरिपक्वता को नहीं दर्शाता। वरन् एक सुविचारित सोच, कठोर अनुशासन और आदर्श को हमारे सामने रखता है।
दुर्भाग्य से स्वतंत्राता के बाद हमारे नेताओं ने छात्रों से कहा कि देश के लिए उनकी भूमिका समाप्त हो गई है। वे अपनी पढ़ाई करें और अपना कैरियर देखें। परिणामतः देश को बनाने और संवारने के लिए तैयार जोशीले, निःस्वार्थी, आदर्श से भरे हुए, कठोर परिश्रम से पीछे न हटने वाले छात्रों का समूह गहरी निराशा में चला गया। और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका के प्रति दिग्भ्रमित हो गया। इसी समय देश के प्रबु( राष्ट्रवादी प्राध्यापकों और छात्रों ने राष्ट्र निर्माण में अपनी सशक्त भूमिका के निर्वहन के लिए विचार-विमर्श शुरू किया। और देशभर के निराश लक्ष्यहीन छात्रों को राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगाने के लिए ‘9 जुलाई सन् 1949’ को ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्’ की स्थापना की। इतिहास साक्षी है कि तब से लेकर अब तक संविधान में देश का नाम इंडिया की जगह भारत लिखा जाए। शिक्षा का ढांचा पूरी तरह भारतीय हो के आन्दोलन से लेकर गुजरात का प्रसि( छात्र आन्दोलन, बिहार आन्दोलन से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का सबसे बड़ा छात्र आन्दोलन जिसमें विद्यार्थी परिषद् के छात्र नेताओं के आह्वान पर जयप्रकाश नारायण ने उसका नेतृत्व स्वीकार किया फलतः देश एक तानाशाह को सबक दे सका। 
छात्र आन्दोलन के समर्थन में ऐसे तमाम प्रसंगों से इतिहास भरा पड़ा है जिसमें छात्रों ने अपने कैरियर की चिन्ता करते हुए देश के निर्माण में भी अपना अप्रतिम योगदान दिया।
अब सवाल यह है कि देश में सब कुछ ठीक हो गया है? या छात्र अब इस लायक नहीं रहा कि वह देश के विकास में अपना योगदान दे सके? क्या इस देश से भ्रष्टाचार का समूल नाश हो गया है? जिसके विरु( छात्र असन्तोष पनपता है। क्या भारत में भारत के लिए भारतीय शिक्षा प्रणाली लागू हो गई है। क्या छात्रों को प्रोपफेशनल काॅलेजों में बिना डोनेशन के प्रवेश मिल रहा है? उस पर भी उन्हें वहां अपेक्षित सभी सुविधाएं दी जा रही हैं या वर्षभर किसी न किसी बहाने पैसा उगाही का हथियार बना रखा है। देश में नैतिक पतन अपने चरम पर है। विद्यार्थियों के लिए आवश्यक समझा जाने वाला घी, दूध यूरिया से बनाया जा रहा है। सब्जियों में हानिकारक रसायन से कलर किया जा रहा है। फल हानिकारक रसायन से अखाद्य हो चुके हैं। नौकरी पाने के लिए मोटा पैसा रिश्वत के रूप में दिया जा रहा है।
पढ़ाई के लिए जरूरी बिजली दिन में छः या आठ घण्टे शहरों में और गांवों में पूरे सप्ताह में पांच-छह घंटे आती है। एन.जी.ओ. अधिकांशतः भ्रष्ट हैं या कुछ निजी स्वार्थ की राजनीति में लिप्त है। और इन सबके विरु( कौन सी संस्था है जो आवाज उठा रही है। क्या इन सबको नियति के भरोसे छोड़ दिया जाए।
शिक्षा में सुधार के लिए तरह-तरह की कमेटियां बनाई गईं। 1948-49 में राधाकृष्णन कमेटी। 1952-53 में मुदालियार कमेटी। 1964-66 में कोठारी कमीशन। परन्तु सरकार ने अपने ही द्वारा गठित कमेटियों की महत्वपूर्ण सिपफारिशों को लागू नहीं किया। छात्रसंघों के लिए बनी लिंगदोह कमेटी भी छात्रों के अधिकारों को सीमित ही करती है। छात्रों के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव का सुझाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर कुठाराघात है। हजारों छात्रों द्वारा अपने प्रतिनिधि के रूप में चुने गए छात्र नेताओं को परिसर से बाहरी छात्र नेता बताकर उसकी अनदेखी करना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व प्रक्रिया की अपेक्षा तो है ही यह स्थिति छात्र आन्दोलनों को कुंद करने की साजिश की तरपफ भी इशारा करती है। 
वस्तुतः आज के समय में ही छात्र आन्दोलन की आवश्यकता सर्वाधिक है। यह आवश्यकता छात्रों के अपने भविष्य और इस तरह देश के सुन्दर भविष्य के लिए ही अधिक है। ध्यान रहे छात्रों के कैरियर को बनाने के लिए कोई और आगे नहीं आयेगा। स्वयं छात्रों को आगे आना होगा। और वे इसमें सक्षम भी हैं। छात्रों के कैरियर के नाम पर उन्हें आन्दोलनों में हिस्सा न लेने के लिए बरगलाने वालों से उन्हें सावधान रहना होगा। मुझे कई ऐसे आन्दोलनों की जानकारी है जहां अगर छात्रों ने अपने बर्बाद होते कैरियर को बचाने के लिए स्वयं लम्बे संघर्ष का सूत्रापात न किया होता तो उनका भविष्य अंधकारमय था उनकी बात को कोई दूसरी संस्था उठाने वाली नहीं थी। इसी तरह राष्ट्रीय एवं सामाजिक विषयों में भी उन्हें अपनी ऊर्जा लगानी होगी। यह ऐसे ही होगा जैसे कि जिस जहाज से हमें पार उतरना हैं उनके छिद्र ठीक कर रहे हों। तभी तो जब हम पढ़कर निकलेंगे तो हमें अपनी मंजिल तक ले जाने वाला जहाज हमें तैयार मिलेगा। हमारा जहाज तो हमारा अपना स्वस्थ सुगठित, समृ( देश ही है। 
भारत इस समय सर्वाधिक युवा शक्ति वाला देश है। पर इस अथाह शक्ति को राष्ट्र निर्माण में लगाने के लिए हमारी सरकार के पास कोई एजेंडा नहीं है। छात्रों को सही शिक्षा मिले, निर्बाध शिक्षा के लिए सभी सुविधाएं मिले और शिक्षा के बाद उसकी उपयोगिता के लिए रोजगार के अवसर मिलें। इसका कोई विचार हमारी सरकार नहीं कर रही। इस स्थिति में एक बार पूरी शक्ति और एक जुटता से छात्र युवा समुदाय को ही विचार करना पड़ेगा। देश की भयानक होती जा रही समस्याओं के प्रति आत्मघाती उदासीनता को तोड़ना होगा और एक बार  लम्बे और प्रभावशाली छात्र आन्दोलन को पूरे देश में हर छोटी-बड़ी समस्या को उखाड़ पफेंकने हेतु फैलाना होगा। छात्र आन्दोलन का व्यापक विस्पफोट ही बहरी हो रही सरकार के कान खोल सकेगा। तभी छात्र का भविष्य बनेगा और देश का भी। 

छात्रा आन्दोलन




विश्वभर में छात्र-छात्राओं की विशेषतः महाविद्यालय-विश्वविद्यालयों में पढ़ने वालों की एक विशेषता है शिक्षित युवक होने के नाते वे स्वयं विचार कर सकते हैं, इसलिए वे अच्छे आलोचक हैं, अन्याय का विरोध करने की क्षमता रखते है। स्वयं में परिवर्तन ला सकते है। उसकी इन क्षमताओं के कारण विश्व में छात्रा आन्दोलन समय समय पर होते रहे। इन छात्रा आन्दोलनों में छात्राओं की सहभागिता भी रही, क्या है, उसकी उपयोगिता क्या और उसके जीवन में उसका कोई प्रभाव रहा इसके बारे में इस लेख में मेरे अनुभव के साथ रखने का यह प्रयास है। वस्तुतः छात्राओं के बारे में अलग सोच-विचार करने की आवश्यकता ही नहीं छात्र-छात्रा दोनों के समान गुण हैं। युवक-शिक्षित-युवक होने के नाते आज महाविद्यालय-विश्वविद्यालय में छात्रा छात्रों के बराबरी से शिक्षा प्राप्त करती हैं। व्यवसाय-नौकरी भी करती हैं। लेकिन प्रमाण सभी जगह 50-50 प्रतिशत नहीं है। छात्र आन्दोलनों में छात्र संगठनों में भी उनकी सहभागिता है लेकिन बराबरी की नहीं। पर  उनकी उपस्थिति अवश्य है। उनकी उपस्थिति निर्देश करती है कि उसमें यह क्षमताएं हैं। समाज में महिलाओं की स्थिति अलग होने के कारण अलग विचार करने की आवश्यकता है भारत में स्वतंत्र ता आन्दोलन में, सत्याग्रहों ने, क्रांतिकारियों की गतिविधियो में आजाद हिन्द फौज में छात्राओं की अपनी भूमिका रही। उसके बाद में 74 के छात्रा आन्दोलनों में तथा 75-77 के आपात्काल के समय सत्याग्रह में भी छात्राएं सहभागी रहीं। जेलों में रहीं, सामाजिक कारणों से, विवाह 19-20 वर्ष की आयु में होने के कारण लम्बे समय तक कार्यरत रहना सम्भव न होने के कारण संगठनों के वरिष्ठ पदों पर रहना, तथा नेतृत्व में लम्बे समय रहना कठिन रहता है इसलिए शीर्ष नेतृत्व में उनकी अनुपस्थिति दिखती है। पिफर भी सामाजिक परिवर्तन के साथ बदलाव आ रहे हें। अभाविप में छात्रा सहभाग का शुरू से आग्रह रखने के कारण सभी प्रांतों में अभी छात्राओं का सहभाग है, कुछ प्रान्तों में नेतृत्व भी देता है। महिला महाविद्यालयों के प्रश्नों को लेकर सम्पूर्ण आन्दोलन केवल छात्राओं द्वारा चलाने के बिहार जैसे प्रान्तों से भी उदाहरण है। 
राष्ट्रीय आन्दोलनों में कश्मीर का आन्दोलन, गुवाहाटी सत्याग्रह, शैक्षिक आन्दोलन, तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के विषयों के प्रदर्शनों में सहभागी रही इतना ही नहीं ये अग्रणी भी रही। लाठी खायीं और जेलों में भी गईं, रास्ते पर के कार्यक्रम जैसे रास्ता रोको, नुक्कड़ सभा आदि कार्यक्रमों में भी सभी प्रांतों में छात्राएं सहभागी रहती है। 
छात्रा विषय को लेकर छात्राओं ने पुलिस स्टेशन के घेराव किया था चर्चा के लिए पुलिस ने छात्र कार्यकर्ताओं को बुलाया था लेकिन उन्होंनें कहा चर्चा छात्राओं के साथ होगी पुलिस को यह मान्य नहीं था। अंतिमतः उनको छात्राओं से ही चर्चा करनी पड़ी छात्राओं के बारे में समाज में परिवर्तन लाने के लिए ऐसी घटनाओं का अपना प्रभाव है।
छात्राओं की समस्याओं को लेकर जैसे  महाविद्यालय परिसर में बलात्कार की घटना, प्राध्यापकों द्वारा छेड़छाड़ की घटना -देशभर में जगह-जगह पर आवश्यकतानुसार छात्रा-छात्राओं के आंदोलन हुए। 
समाज में रास्ते पर के आन्दोलन के साथ वैचारिक आन्दोलन के विषय समाज की मानसिकता में बदलाव लाने का और छात्राएं सभी प्रकार के संगठनों के कार्य कर सकती है, निर्णय क्षमता रख सकती है इस पर समाज का विश्वास निर्माण करके, भारतीय दृष्टिकोण से महिला का समाज में सम्मान का स्थान निर्माण करने का-विचार प्रभावी करने में विद्यार्थी परिषद् की छात्राओं ने अपनी कृति से अपनी अहम् भूमिका निभाई है।
विद्यार्थी परिषद् से महिला सम्बंधित भारतीय विचार की प्रेरणा लेकर विश्व मंच पर भी अपना दृष्टिकोण रखने का प्रयास कार्यकर्ताओं ने अपने व्यवसायी जीवन में किया है एक कार्यकर्ता को अमेरिका से विशेष थ्मससवूेीपच भी प्राप्त हुई थी।
किसी भी छात्र आन्दोलन से, संगठन से युवक एक आदर्शवाद को लेकर जीवन भर उसी राह चलने की जीवन दृष्टि प्राप्त करता है।
विद्यार्थी परिषद् से जीवन दृष्टि लेकर अनेक छात्रा कार्यकर्ता अपने जीवन में कार्यरत है।
मुम्बई -महाराष्ट्र के पूर्व छात्रा कार्यकर्ताओं ने मिलकर महिला समस्याओं को लेकर भारतीय भूमिका को प्रस्थापित करने के लिए अन्य अनेक महिलाओं को जोड़कर संगठन खड़ा किया।
कर्नाटक में भी स्वतंत्रा रूप से महिलाओं के लिए कार्य करने वाली, महिलाओं के लिए अर्थाजन के लिए विशेष प्रकल्प चलाने वाली पूर्व कार्यकर्ता प्रभावी कार्य कर रही है।
पूर्व छात्रा कार्यकर्ता केवल महिलाओं के लिए ही काम करती है ऐसा नहीं कर्नाटक में ही एक कार्यकर्ता ने ग्रामीण क्षेत्रा बच्चों को लेकर काम शुरू किया ताकि अपाहिज बच्चों का भी विकास हो। सम्मानित जीवन जी सके इसलिए नये तरीके से कार्य खड़ा किया जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया गया। और वे आज इस क्षेत्रा में अंतरराष्ट्रीय साख अपने संस्कार संस्कृति को इस माध्यम से लोगों तक पहुंचाना है। मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश में भी कुछ कार्यकर्ता अपाहिजों के लिए महिला उद्योग के प्रकल्प चलाती है, 
कुछ छात्रा कार्यकर्ता अपना पूरा जीवन  ही पति के साथ जनजाति क्षेत्रा में ग्रामीण विकास के कार्य कर रहीं है।
ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते है लेकिन इन उदाहरण देने का कारण यह है कि इन सभी को छात्र संगठन में रहने से यह प्रेरणा मिली है। ऐसे कई कार्यकर्ता अपने अपने क्षेत्रा में नौकरी, व्यवसाय में भी इसी मनोभाव से, दृष्टि लेकर अपना प्रभाव क्षेत्रा निर्माण करते हैं।
समाज में किसी भी विचार/दर्शन का प्रभाव छात्रा जीवन में सबसे अधिक होता हैं। छात्रा आन्दोलन की प्रासंगिकता इसलिए हमेशा ही रहेगी। शायद उसका दृश्य स्वरूप काम करने के शैली में अंतर आ सकता है। उनके आग्रह के मुद्दे बदल सकते हैं, लेकिन छात्रा आन्दोलन का अपना स्थान रहेगा ही और छात्रा-छात्रा अपनी भूमिका जो समाज में एक प्रहरी की है निभाते ही रहेंगे ऐसा विश्वास है। और छात्र आन्दोलन से उभरा हुआ नेतृत्व  जीवन में अन्याय का विरोध करना, तथा आपत्तियों में सक्रिय होना यह उसका स्वभाव है। हर क्षेत्रा में आगे जाकर नेतृत्व देगा। जब तक समाज में अन्याय है, दुःख है, नैसर्गिक, मानवनिर्मित आपत्तियां है, तब तक छात्र आन्दोलन की प्रासंगिकता रहेगी ही। 


सार्वजनिक जीवन में आदर्श हस्तक्षेप का प्रतिनिधि


छात्र आन्दोलन आधुनिक सार्वजनिक जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा है। विशेषकर उच्च शिक्षा में ... छात्र, जो कि वयस्क है तथा मतदाता भी है। वह निश्चय ही ‘कल का नहीं वरन् आज का नागरिक है। समझौता परस्त सार्वजनिक जीवन में आदर्श हस्तक्षेप का प्रतिनिधि बन जाता है। छात्र आन्दोलन बहुत पुरानी घटनाओं एवं दुनिया के विभिन्न देशों के आन्दोलनों की कहानी के बजाय हमें अपने ही जीवन काल की घटनाओं से इसे समझना चाहिये।
1974 का बिहार-गुजरात आन्दोलन, जो व्यवस्थागत यथा स्थितिवाद एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ युग के युवा की हुंकार के समान था, प्रथमतः वह छात्र आन्दोलन ही था। इसी आन्दोलन ने अपने युग के वयोवृ ( लेकिन क्रांतिधर्मी बीज बाबू जयप्रकाश नारायण को पुनः सार्वजनिक जीवन में आने के लिये बाध्य कर दिया। बाबू जयप्रकाश नारायण का जीवन सुदीर्घ तपस्या एवं परिपक्व अनुभवों का पुंज था। युवको चित प्रखरता, आदर्शवाद, बलिदान की क्षमता एवं उत्साह के पुंज छात्र आन्दोलन को जयप्रकाश का नेतृत्व प्राप्त हुआ, परिणामतः .... राष्ट्र ही आन्दोलन मंच हो गया। घबराई राज्य शक्ति ने आपातकाल का कवच ओढ़ लिया, लोकतंत्रा की हत्या कर दी गयी। पुनः आपातकाल के खिलापफ जो चुनौतिपूर्ण आन्दोलन हुआ, उसमें छात्रों की भूमिका सब से बड़ी रही। 60» से ज्यादा सत्याग्रही छात्र थे। आपातकाल परास्त हुआ। लोकतंत्र का पुनरोदय हुआ। यह सि( हुआ कि ‘छात्रा शक्ति वस्तुतः राष्ट्रशक्ति’ है। ये तो युगातंकारी आन्दोलन थे, ऐसे आन्दोलन रोज नहीं हुआ करते।
व्यवस्था को जकड़ने वाले यथा स्थितिवाद को तोड़ने के लिये सदैव ही छात्र आन्दोलन की आवश्यकता रहती है। शिक्षा का जिस तरह बाजारीकरण हो रहा है, निश्चय ही इसके खिलापफ छात्र आन्दोलन की आवश्यकता है। भारत का छात्र सामान्यतः अपने माता-पिता के खून-पसीने की कमाई से शिक्षा पाता है। व्यवस्था में व्याप्त अनीति एवं कदाचार के कारण बढ़ती महंगाई को आज का उच्च शिक्षा में रत छात्रा ज्यादा अच्छी प्रकार से समझता है। यदि वह इस कारण आन्दोलनमान होता है तो इसे अस्वाभाविक नहीं कहा जाना चाहिये। शिक्षा परिसरों में बढ़ती घिनौनी राजनीति एवं नौकर शाही करण, अकादमिक वातावरण को लील रहा है, इसके खिलापफ छात्रों को आन्दोलित होना चाहिये। संवेदनहीन व्यवस्थायें तथ्य एवं तर्कों के आधार पर नहीं वरन् निहित स्वार्थो के हितार्थ अनेक निर्णय छात्रों पर आरोपित करती है। यथा कम्प्यूटर लाबी को खुश करने के लिये तथा उनसे अपने हितो को साधने के लिये बिना बिजली व कक्षों की व्यवस्था लिये तथा बिना उपयुक्त अध्यापकों की व्यवस्था के कम्प्यूटर शिक्षा को अनविार्य कर छात्रों से शुल्क वसूल लिया जाता है, ऐसे अनेक मुद्दे होते है। छात्र आन्दोलन ही इन कुप्रवृतियों को नियंत्रित करने का एक मात्रा साधन है।
नौजवान कभी-कभी अति उत्साह में व्यावहारिक गलतियाँ करते है, कभी-कभी राजनेता उन्हें अपने चंगुल में पफंसा लेते है तथा कभी-कभी अवांछनीय तरीके भी इन आन्दोलनों में घुस जाते है। ऐसे में प्राध्यापक वर्ग का कर्तव्य बनता है कि वे छात्रों के आन्दोलन का समुचित मार्गदर्शन करें तथा समाज संजीदा लोग छात्रो के साथ आकर खड़े हो।
छात्रा आन्दोलनरत है तथा सभी प्राध्यापक उससे विरत है, इसी प्रकार छात्र आन्दोलनरत है तथा समाज का सक्रिय तथा संजीदा वर्ग उससे निरपेक्ष बना हुआ है, यह भी एक अवांछनीय स्थिति है। छात्रों की अपरीपक्वता को कुछ पूरक सहायता चाहिये होती है। इस पूरक सहायताओं के लिये समाज यदि तैयार नहीं है तो उन्हें अपने बच्चों की अपनी व्यवस्था के परिणामों को भुगतना चाहिये। इन कारणों से छात्रा आन्दोलनों को दोषी ठहराना अनुचित है।
परीक्षा का अकादमिक वातावरण मुख्यतः प्राध्यापकों एवं प्रशासन के नजरिये पर निर्भर रहता है। छात्र आन्दोलन से यह वातावरण नहीं बिगड़ता। वास्तव में योग्य अकादमिक वातावरण तो आन्दोलन की सार्थकता का कारण बनता है। अकादमिक रूप से दक्ष एवं सचेत आन्दोलनकारी ज्यादा गम्भीर एवं जिम्मेदार होता है। शिक्षा परिसरों में अकादमिक वातावरण के बिगड़ने के लिये जिम्मेदार तो कुलपतियों एवं प्राध्यापकों की नियुक्ति में होने वाली राजनीति है। आकादमिक दृष्टि से शून्य प्रशासन, आग में घी का काम करता है। विश्वविद्यालयों की खत्म होती स्वायत्ता एवं सीनेट, सिन्डीकेट एवं एकेडेमिक काउंसिल जैसे निकायों का निष्प्रभ हो जाना, इनमें नौकरशाही का अवांछनीय प्रभाव हो जाना आदि ऐसे कारक है जिन्होनें विश्वविद्यालयों के अकादमिक वातावरण को शिथिल किया है। छात्रा संघ के चुनाव या छात्रा आन्दोलनों पर यह तोहमत मढ़ना ‘उलटा चोर कोतवाल को डाँटे’ वाली कहावत को चरितार्थ करना है। ‘आज के छात्र आन्दोलन के लिये कोई विषय अविषय नहीं रहता। समाज का प्रत्येक विषय छात्र का विषय है, क्योंकि वह वयस्क नागरिक के रूप में समाज का हिस्सा है। छात्र आन्दोलन की इस युगीन प्रासंगिकता को सपफल कर छात्र संगठनों को अपना दायित्व निभाना चाहिये तथा समाज को इसके लिये सहकारी की भूमिका स्वीकार करनी चाहिये।



छात्र आन्दोलन



छात्र आन्दोलन के सामने बहुत चुनौतियां है। विविध पाठ्यक्रम शुरू होने से परिसर का स्वरूप बदला है। इस कारण कैरियरीज्म आया है। तकनीकी शिक्षा व नयी कौशल युक्त विधाओं में काम करने का छात्रों को मौका मिल रहा है। विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने का मौका मिल रहा हे। नौकरियां भारत में और विदेशों में प्राप्त हो रही है। IT में काम करने का अवसर मिल रहा है।
लेकिन प्राथमिक शिक्षा से Dropout की संख्या अभी भी 60% से कम नहीं हुई है। ग्रामीण क्षेत्रा के विद्यालय पढ़ाने के नाम पर खानापूर्ति करते हैं। इस कारण अशिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है। गरीब व अमीर में अन्तर बढ़ रहा है। देहात से प्रचण्ड प्रमाण में शहरों की ओर पलायन हो रहा है। ऐसी स्थिति में छात्र आन्दोलन नाम की चीज़्ा जो मुख्यतः क्षेत्राीय परिवर्तन व छात्रों के जुड़ाव से सम्ब( है।
1 आज शिक्षा के व्यापारीकरण के दौर में जो पैसा खर्च कर सकते हैं वही शिक्षा प्राप्त कर सकते है। यह छात्र आंदोलन के सम्मुख चुनौती है।
2 दूसरी ओर पर्यावरण देखे तो पानी का स्तर नीचे जाना, ग्लोबल वार्मिंग की दृष्टि से कार्बन इमीशन का प्रमाण बढ़ना, विकसित देशों का विकाशील देशों पर कार्बन इमीशन कम करने का दबाव भी एक चुनौती है।
वही एक ओर विद्यार्थियों का सामाजिक परिवर्तन के लिए भी प्रयास आवश्यक है। सुदुर वनवासी क्षेत्रा में जिस प्रकार का वातावरण बनाया जा रहा है। जिससे हिंसाचार, आतंक बढ़ रहा है, इस कारण जनजीवन, विकास आदि पर जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। यह चुनौती भी विद्यार्थी के सम्मुख है।
खाओ, पिओ और मजा करो वाला भौतिक चितंन विद्यार्थी में बढ़ रहा है। यह एक चुनौती भी विद्यार्थी आन्दोलन के सामने है कि कैसे उन्हें देश व समाज की और उन्मुख करें। उनकी शक्ति का उपयोग देश के समाज के हित में हो यह भी एक चुनौती अभाविप के सम्मुख है।
पूरी तरह से छात्र आन्दोलन खत्म हो गया, यह अर्धसत्य है। राजनीति से छात्र आन्दोलन प्रेरित है यह भी अर्धसत्य है। कोई भी आन्दोलन बाह्य परिस्थिति के संदर्भ में देखा जाता है। जब विद्यार्थी ने महंगाई व भ्रष्टाचार को चुनौती देने का प्रयत्न किया तो उस समय अन्य दलों ने आकर उसका राजनैतिक उपयोग किया। इसलिए अभाविप ने राजनीति से अलिप्त रहते हुए स्वतंत्रा छात्र संगठन के रूप में काम किया। अतः छात्र आन्दोलन राजनीतिक हो गया यह पूर्णसत्य नहीं है।
परंतु विद्यार्थी नागरिक भी है इसलिए अगर वह सामाजिक समस्याओं के प्रश्न राजनीति से पूछता है या राजनीति में सक्रिय होता है तो छात्र संघ चुनाव में भाग लेता है इसमें कुछ गलत भी नहीं है।
यह कहना छात्र आन्दोलन हिंसक है। यह छात्रा आन्दोलन के साथ अन्याय है। कश्मीर आन्दोलन हुआ 10,000 से अधिक छात्र श्रीनगर के लालचैक पर तिरंगा पफहराने गये। देश की सुरक्षा के विषय पर छात्रा ने निर्णायक संर्घष किया। कोई हिंसा नहीं हुई।
शिक्षा के व्यापारीकरण के विरोध में दिल्ली में 2002 में 75,000 छात्रों ले रैली की। जिसमें सब छात्र ट्रेन व बस का किराया देकर आया। कहीं कोई दुर्घटना कोई हिंसा किसी लूटपाट की कोई घटना नहीं हुई।
घुसपैठ के खिलापफ आन्दोलन में 50,000 विद्यार्थियों ने किशनगंज में रैली की। कहीं पर कोई हिंसा नहीं हुई।
आपातकाल के पहले और बाद में तात्कालिक राजनैतिक परिवर्तन के रूप में जो परिणाम हुआ वह हर बार अपेक्षित नहीं है। पूर्वाग्रह के दृष्टिकोण से छात्र आन्दोलन को देखना ज्यादा राजनैतिक है वनिस्बत राजनैतिक आन्दोलन के।
छात्रों के तकनीकी विषयों की ओर मुड़ने से छात्रा आन्दोलन में थोड़ी कमी आई है। काॅलेज का वातावरण परिवर्तित हुआ है। विद्यार्थियों का सामाजिक प्रश्नों के साथ जुड़ना, राष्ट्रीय प्रश्नों के साथ जुड़ना, शिक्षा के व्यापारीकरण व उसके दुष्परिणाम के बारे में जागरूक करना उसे छात्र आन्दोलन कहा जाता है।
इस वर्ष बिहार में ।डन् की शाखा खुलने के खिलापफ विद्यार्थियों का प्रदर्शन हुआ। उन पर लाठीचार्ज होने के बाद बिहार बंद रहा। पर आन्दोलन का प्रभाव होता है। इसलिए छात्रा आन्दोलन समाप्त हो गया ये यथार्थ नहीं हैं। छात्रों की समस्या से सम्ब( विषय उठाने पर छात्रा आज भी एकत्रा आता है।
सोशलसाइट्स/आरकुट/पफेसबुक/ट्वीटर/ब्लाग के माध्यम से छात्रा अपनी बात व समस्या के बारे में समान्य जन व सरकार को सहज तरीके से बता पाते हं। इंटरनेट एक सशक्त माध्यम बना है। Expression of thought  व Collection of knowledge   बना है। इसी क्रम में अभाविपVidhyapatha.com,   इस प्रकार जो नये रास्ते प्राप्त हुए है इनका उपयोग ठीक ढंग से करने की जिम्मेदारी वर्तमान पीढ़ी की है।
छात्रा आन्दोलन का तात्कालिक स्वरूप एक अलग विषय है। उसमें सपफलता, विपफलता, समझौता, चुनाव ये सब विद्यार्थी शक्ति का प्रकटीकरण है। जिससे विद्यार्थियों का नेतृत्व उभरता है।
लेकिन छात्रा आन्दालन से जब सामाजिक दृष्टि, जीवन दृष्टि मिले तब ही छात्र आन्दोलन की सार्थकता है।
जब आज का विद्यार्थी समाज जीवन में जाएगा तो वह समाज को सहयोग करें। विद्यार्थी परिषद् के माध्यम से उसे एक ऐसी दृष्टि मिलनी चाहिए की वह एक आदर्श प्रस्तुत करें। भ्रष्टाचार, व्यापारीकरण, भौतिकवादिता, व्यक्तिवाद सब तरपफ है। यह सब कहना बहुत सरल है केवल उस समय ही उसका प्रभाव नहीं, बल्कि जीवन भर उसका प्रभाव रहना चाहिए।
जितनी चुनौतियां समाज के सम्मुख है उनके समाधान के लिए व्यक्तिगत रूप से या संगठित रूप से प्रयास आवश्यक है। जो राजनीति में जाते है, जाएं परन्तु सामाजिक दृष्टि से जाए, एवं समाज के सर्वांगीण विकास के लिए कुछ योगदान करें।
अ.भा.वि.प. राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लक्ष्य के लिए काम कर रही है। किन्तु राष्ट्र परिवर्तन या राष्ट्र पुनर्निर्माण, व्यक्ति निर्माण से संभव है। व्यक्ति निर्माण या व्यक्ति परिवर्तन सद्गुणों की वृ(ि से हो सकती है। एवं सद्गुणों में वृ(ि प्रेरणा देने से संभव है। यह सब बाते विद्यार्थी परिषद् के माध्यम से हो सकती है। यह प्रेरणा जीवन का अंग बनना चाहिए। उससे देश के लिए विद्यार्थी शक्ति को बड़े परिमाण में लाभ होगा।

RFI is the movement aim of which is to make India as strong country by the way of education every body want the progress of country but only few people are shining our country is more ahead infield to number of rich people – scientist, industrialists, art, sports, literature, space science which makes us feel proud. But there is something which is obstacle to path of progress that is poverty, illiteracy. Several intelligent poor cannot continue their study and due to their poverty. Which leads to them toward harassment. So we have to fight with that harassment we will give them opportunity and education.Commercialization of education has created two zone between students on one hand there is a community of those students which have full of opportunities and resources but on other hand there is another community of student which found themselves to heard to continue their education. So the population of India which is understand as weakness, we have to make that as our strong. Because those who are not studying and are not getting opportunities are forcing to handling guns. So there is necessary to make them skill full and give them opportunities so that they can also make there identity like bio and cultural diversity of India.So rebuilding of nation is our thought to make it leader of world. For that we have to educat the poor one and also provide him opportunity. So RFI will do all that. We will not only providing free education to intelligent poor by giving free books and financial support them but opportunities for job also.
Thanks for all supporters . 

Man behind RFI Gaurav Sharma born on 2nd July, 1980 in Royal Land of Rajasthan at Bundi. Who stuided upto B.A. LLB but alongwith his study he also give time to RSS, ABVP. He had been involve in the ABVP Since 1997 as a wholetimer from 2004 to 2010. And was send to North- East to work with ABVP. But situations was not good there is problem of sepration in Purwanchal he give his best to SEIL and played his important role for that.
After that he was send to Chittor, Udaipur, Ajmer, Bhilwara, Banswara, Kota, Bundi, Durgarpur, Rajsamand and Pratapgarh for the work of ABVP.awarded his to give a big responsibility at Delhi as National Chief of the magzine named Rashtriya Chatrashakti.As his life is fully inspired by RSS - so after leaving as whole times job he is doing for poor inteligent student and he is main thinker behind the revolutionary idol of RFI.

RFI



आर.एफ.आई. यह एक अभियान है। जो भारत को शिक्षा के माध्यम से सजग एवं प्रभावी भूमिका में देखना चाहता है। आज हमारा देश आगे बढ़े यह सद्इच्छा सबके मन में है। देश में मुट्ठीभर लोग तो विश्व को देदीप्यमान करने जा रहे हैं। धन कुबेरों में, वैज्ञानिकों में, उद्यमियों में, कला में, क्रिड़ा में, साहित्य में, अंतरिक्ष के अनुसंधान में, आयुद्य विकसित करने में भारत अग्रगण्य है। इससे भारत का गौरव बढ़ा है। महाशक्तियों के सिंहासन दोलायमान है। वहां के शासनाधीश आह्नान कर रहे है। पढ़ों नहीं तो भारतीय आ जायेंगे। पर भारत में कुछ ऐसा है। जो भारत की प्रगति में बाधक है। गरीबी व अशिक्षा जैसी बड़ी समस्याएं है। हमारी असंख्य प्रतिभाएं गरीबी, अशिक्षा, व अवसरों के अभाव के कारण शीर्ष पर नहीं आती है। जिस कारण योग्य लोगों के मन में कुंठा उत्पन्न होती है। उस कुंठा का मर्दन करने के लिए आवश्यक है कि उन्हें अवसर व शिक्षा उपलब्ध करवायी जाये। शिक्षा के व्यापारीकरण ने देश के छात्र समुदाय को दो भागों में विभाजित कर दिया है एक और वह छात्र है जिनके पास संसाधनों की कमी नहीं है वो हर प्रकार की शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं। दूसरी और निर्धन छात्र शिक्षा व अर्थाभाव में आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं। या आपराधिक प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर होते हैं।
जिस जनसंख्या को लोग भार कहते थे। उसी जनसंख्या को शिक्षा के माध्यम से ताकत बनाना है। क्योंकि जो अध्ययन नहीं कर पा रहा है। जिन्हें अवसर का अभाव है। इसका लाभ उठाकर कुछ ने छात्रों में कलम की जगह बंदूक थमा दी है। ऐसे छात्रों को कौशलयुक्त बनाया जाये। भारत की छात्र प्रतिभाएं भी विश्व पटल पर पहचान बनाये। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमने यह अभियान शुरू किया है।

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